हिंदी सिनेमा में जासूसी कहानियों का आकर्षण लगातार बना हुआ है। गंभीर जासूसी अभियानों, देशभक्ति और रोमांच से भरी फिल्मों के बीच निर्देशक आकाश ए. कौशिक की फिल्म ‘उड़ता तीर’ एक अलग रास्ता चुनने की कोशिश करती है। आयुष्मान खुराना और सारा अली खान अभिनीत यह फिल्म जासूसी की दुनिया को हास्य के नजरिये से दिखाती है। कहानी का विचार दिलचस्प है, कलाकारों का अभिनय कई जगह मनोरंजन करता है, लेकिन कमजोर पटकथा और बदलते कथानक के कारण फिल्म अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल नहीं कर पाती।
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसका अनोखा आधार है। एक पाकिस्तानी जासूस भारत में गुप्त अभियान पर आता है, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बदलती हैं कि वह अपनी असली पहचान ही भूल जाता है। इसके बाद वह खुद को भारत का रक्षक समझने लगता है और उसी व्यवस्था के लिए काम करने लगता है, जिसे नुकसान पहुंचाने की जिम्मेदारी लेकर वह आया था। यही उलटफेर फिल्म में हास्य और भ्रम की स्थितियां पैदा करता है।
याददाश्त खोने वाले जासूस की दिलचस्प कहानी
फिल्म में आयुष्मान खुराना बिलाल अहमद की भूमिका में हैं, जो भारत में विक्रांत थापर की पहचान के साथ काम कर रहा एक पाकिस्तानी जासूस है। उसका उद्देश्य भारत की सुरक्षा व्यवस्था में सेंध लगाना है। लेकिन एक घटना के बाद उसकी याददाश्त चली जाती है और वह खुद को भारतीय सुरक्षा बल का अधिकारी समझने लगता है।
इसके बाद कहानी में कई अप्रत्याशित मोड़ आते हैं। जिस व्यक्ति को अपने असली उद्देश्य को पूरा करना था, वही अब अपने पुराने साथियों के लिए मुसीबत बन जाता है। पाकिस्तान में बैठे उसके अधिकारी परेशान हैं, जबकि भारत में उसके संपर्कों के लिए भी उसकी बदली हुई पहचान को समझना मुश्किल हो जाता है।
फिल्म की शुरुआत में यह विचार काफी प्रभावशाली लगता है। जासूसी फिल्मों में दिखाई जाने वाली गंभीरता, गुप्त अभियानों और देशभक्ति से जुड़े परिचित दृश्यों को हास्य के माध्यम से देखने का अवसर मिलता है। शुरुआती हिस्से में कई दृश्य इसी वजह से मनोरंजक बन पड़ते हैं। हालांकि, कहानी आगे बढ़ने के साथ फिल्म की दिशा बदलने लगती है। जिस व्यंग्य और हास्य को इसका सबसे बड़ा आकर्षण होना चाहिए था, वह धीरे-धीरे कमजोर पड़ता जाता है। पटकथा एक सुसंगत कहानी कहने के बजाय कई अलग-अलग परिस्थितियों को जोड़ने में उलझ जाती है।
आयुष्मान खुराना ने संभाली फिल्म की कमान
आयुष्मान खुराना ऐसे अभिनेता हैं, जो अपने किरदारों में सहजता और अलग अंदाज लाने के लिए पहचाने जाते हैं। ‘उड़ता तीर’ में भी उनका यही गुण नजर आता है। एक ऐसे जासूस की भूमिका निभाना, जो अपनी असली पहचान भूलकर खुद को दूसरे पक्ष का रक्षक मानने लगता है, आसान नहीं है। आयुष्मान इस भ्रम, असमंजस और हास्य को अपने अभिनय के माध्यम से प्रभावी बनाने की कोशिश करते हैं। उनका अभिनय फिल्म को कई कमजोर क्षणों में भी संभालता है। वह अपने किरदार को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने के बजाय सहज रखने का प्रयास करते हैं। इसी कारण कहानी के कुछ असंगत हिस्सों के बावजूद दर्शकों की रुचि बनी रहती है।
फिल्म में मुकुल देव की उपस्थिति भी उल्लेखनीय है। आतंकवादी अजहर मकसूद की भूमिका में वह हास्य और अजीबोगरीब परिस्थितियों के बीच अपना अलग प्रभाव छोड़ते हैं। यह फिल्म उनके अंतिम पर्दे पर दिखाई देने वाले अभिनय का भी हिस्सा है, जो उनके प्रशंसकों के लिए इसे भावनात्मक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।
गुलशन ग्रोवर और राम कपूर अपने किरदारों के माध्यम से हास्य पैदा करने का प्रयास करते हैं। राहुल बोस, सुहैल नैय्यर और अन्य सहायक कलाकार भी कहानी को आगे बढ़ाने में योगदान देते हैं। कलाकारों की यह टोली फिल्म के शुरुआती हिस्से को मनोरंजक बनाने में काफी हद तक सफल रहती है।
सारा अली खान को नहीं मिला पर्याप्त अवसर
सारा अली खान फिल्म में यामिनी की भूमिका निभाती हैं, जो विक्रांत की पत्नी है और रक्षा मंत्रालय के वित्त विभाग में काम करती है। उनके किरदार के माध्यम से कहानी में पारिवारिक संबंधों और वैवाहिक तनाव का पहलू जोड़ा गया है।
लेकिन पटकथा इस पक्ष को पर्याप्त गहराई नहीं दे पाती। यामिनी के किरदार को कहानी में अधिक स्वतंत्रता और विस्तार मिलने की गुंजाइश थी। इसके बजाय वह मुख्य घटनाक्रम के आसपास ही सीमित रह जाती हैं। आयुष्मान और सारा के बीच संबंधों को भी उतनी मजबूती से नहीं दिखाया गया है, जितनी इस कहानी में संभव थी।
नतीजतन, फिल्म का भावनात्मक पक्ष कमजोर पड़ता है। दर्शकों को किरदारों के रिश्तों से जुड़ने का पर्याप्त अवसर नहीं मिलता और कहानी का ध्यान बार-बार जासूसी अभियान तथा हास्यपूर्ण घटनाओं की ओर चला जाता है।
हास्य और देशभक्ति के बीच उलझी पटकथा
‘उड़ता तीर’ की सबसे बड़ी समस्या इसका बदलता हुआ स्वर है। फिल्म की शुरुआत में जासूसी फिल्मों की परिचित शैली पर व्यंग्य किया जाता है। दोनों देशों की खुफिया व्यवस्था से जुड़े किरदारों को हास्यपूर्ण परिस्थितियों में दिखाया जाता है और कहानी गंभीर विषयों को हल्के अंदाज में पेश करने की कोशिश करती है। लेकिन दूसरे हिस्से में फिल्म अधिक पारंपरिक देशभक्ति की ओर मुड़ जाती है। इस बदलाव के कारण शुरुआती व्यंग्य का प्रभाव कम होने लगता है। कुछ हास्य दृश्य जरूरत से ज्यादा खिंचे हुए लगते हैं, जबकि कुछ प्रसंग कहानी की गति को धीमा कर देते हैं।
निर्देशक आकाश ए. कौशिक, जिन्होंने इससे पहले ‘हाउसफुल 4’ और ‘भूल भुलैया 2’ तथा ‘भूल भुलैया 3’ जैसी फिल्मों के लेखन में योगदान दिया है, इस फिल्म से निर्देशन की शुरुआत कर रहे हैं। उनकी कल्पना में नवीनता है, लेकिन पटकथा उस विचार को लगातार प्रभावी बनाए रखने में सफल नहीं होती। फिल्म में ऐसे क्षण जरूर हैं, जहां हास्य और जासूसी का मेल अच्छा बन पड़ता है। मगर कहानी का संतुलन बार-बार बिगड़ने से ये क्षण एक मजबूत सिनेमाई अनुभव में नहीं बदल पाते।
देखें या नहीं?
‘उड़ता तीर’ एक दिलचस्प विचार पर आधारित फिल्म है, जिसमें आयुष्मान खुराना का अभिनय और सहायक कलाकारों की मौजूदगी इसे देखने लायक बनाती है। अगर दर्शक जासूसी फिल्मों की गंभीरता से हटकर हल्का-फुल्का मनोरंजन चाहते हैं, तो फिल्म के कुछ हिस्से उन्हें पसंद आ सकते हैं।
लेकिन जो दर्शक सधी हुई पटकथा, लगातार प्रभावशाली हास्य और मजबूत कहानी की उम्मीद करते हैं, उन्हें निराशा हो सकती है। फिल्म का पहला हिस्सा अपनी नवीनता से आकर्षित करता है, मगर दूसरा हिस्सा उसी ऊर्जा को बनाए नहीं रख पाता।
कुल मिलाकर, ‘उड़ता तीर’ एक अच्छी संभावना वाली फिल्म है, जो कमजोर लेखन और असंतुलित कथानक के कारण अपने लक्ष्य तक पूरी तरह नहीं पहुंचती। आयुष्मान खुराना का अभिनय इसकी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन केवल अभिनय के सहारे फिल्म की सभी कमियों को दूर नहीं किया जा सकता।
