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माणिक सरकार की याचिका खारिज, एफआईआर रद्द करने से हाईकोर्ट का इनकार
১৩/১০/২০২৬

अगरतला :
त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री और माकपा के वरिष्ठ नेता माणिक सरकार को बड़ा कानूनी झटका लगा है। त्रिपुरा हाईकोर्ट ने कथित भड़काऊ भाषण के मामले में उनके खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) रद्द करने की याचिका मंगलवार को खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि प्राथमिकी में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराधों के संकेत देते हैं और मामले की आगे जांच जरूरी है। हालांकि, अदालत के इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि माणिक सरकार के खिलाफ लगाए गए आरोप साबित हो गए हैं। पुलिस अब मामले की जांच जारी रख सकेगी। 10 अगस्त के राजनीतिक कार्यक्रम से जुड़ा है मामला
यह मामला 10 अगस्त 2026 को अगरतला में आयोजित एक राजनीतिक कार्यक्रम में माणिक सरकार द्वारा दिए गए कथित भाषण से संबंधित है। शिकायतकर्ता प्रबीर रॉय की शिकायत पर पश्चिम अगरतला थाने में 16 अगस्त को एफआईआर दर्ज की गई थी। इसमें भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023 की धारा 192, 353(1)(b) और 61(1) के तहत आरोप लगाए गए हैं। शिकायत के अनुसार, सरकार ने कथित तौर पर कहा था कि यदि राज्य और केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलन की 11 सूत्री मांगों को स्वीकार नहीं किया गया, तो आंदोलन और गंभीर रूप लेगा। शिकायतकर्ता का आरोप था कि भाषण में इस्तेमाल किए गए एक बंगाली शब्द या अभिव्यक्ति का अर्थ उग्र अथवा हिंसक आंदोलन का रास्ता अपनाने से था। शिकायत में दावा किया गया कि इस तरह के बयान से लोगों को भड़काने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने की आशंका थी। हालांकि, माणिक सरकार ने इन आरोपों को चुनौती देते हुए कहा था कि उनके भाषण का गलत अनुवाद किया गया और उसे संदर्भ से अलग करके पेश किया गया। उनके वकील ने दलील दी कि भाषण केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, किसान संगठनों और अन्य नागरिक संगठनों द्वारा बुलाए गए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन के संदर्भ में दिया गया था। सरकार ने राजनीतिक दुर्भावना का लगाया आरोप
पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उन्होंने आंदोलन की मांगों का समर्थन किया था और प्रदर्शनकारियों से गिरफ्तारी के दौरान पुलिस के साथ शांतिपूर्ण सहयोग करने की अपील की थी। उनका कहना था कि भाषण में ऐसा कुछ नहीं था, जिससे एफआईआर में लगाई गई धाराओं के तहत अपराध बनता हो। उन्होंने प्राथमिकी को राजनीतिक रूप से प्रेरित भी बताया। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि भाषण ऐसे समय में दिया गया था, जब कानून-व्यवस्था की स्थिति संवेदनशील थी। राज्य की ओर से अदालत को बताया गया कि पांच हजार से अधिक प्रदर्शनकारियों ने सदर स्थित अनुमंडल दंडाधिकारी (एसडीएम) कार्यालय की ओर मार्च करते हुए सुरक्षा के दो बैरिकेड तोड़ दिए थे और पुलिस ने आगे बढ़ने से रोक दिया था। हालांकि, राज्य सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि बैरिकेड तोड़ने की घटना माणिक सरकार के भाषण से पहले हुई थी और इसके लिए उन्हें सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। राज्य का तर्क था कि भाषण के पूरे संदर्भ और सभा पर उसके संभावित प्रभाव की जांच आवश्यक है। अदालत ने जांच जारी रखने का दिया निर्देश
न्यायमूर्ति टी. अमरनाथ गौड़ और न्यायमूर्ति विश्वजीत पालित की खंडपीठ ने कहा कि शुरुआती चरण में एफआईआर रद्द करने की शक्ति का इस्तेमाल सावधानीपूर्वक और सीमित परिस्थितियों में किया जाना चाहिए। अदालत के मुताबिक, बंगाली अभिव्यक्ति के वास्तविक अर्थ, भाषण के संदर्भ और उसके संभावित प्रभाव से जुड़े विवादित प्रश्नों का फैसला इस स्तर पर नहीं किया जा सकता। पीठ ने जांच एजेंसी को भाषण की पूरी रिकॉर्डिंग, उपलब्ध ऑडियो-वीडियो सामग्री, सभा में मौजूद लोगों की प्रतिक्रिया और घटनाक्रम के संदर्भ की जांच करने की आवश्यकता बताई। अदालत ने यह भी कहा कि वास्तविक दंगा नहीं होने मात्र से भारतीय न्याय संहिता की धारा 192 लागू होने की संभावना अपने आप समाप्त नहीं हो जाती। याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने माणिक सरकार को भविष्य में भड़काऊ या घृणास्पद भाषण देने से बचने और लोगों के बीच शांति, सद्भाव तथा भाईचारे को बढ़ावा देने की सलाह दी। उनकी उम्र और मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल को ध्यान में रखते हुए अदालत ने यह भी कहा कि वह उचित जमानत याचिका निचली अदालत में दाखिल कर सकते हैं, जिस पर निर्धारित शर्तों के अधीन विचार किया जाएगा।মূল প্রতিবেদনে যান ↗