राम बालक, सन्मार्ग संवाददाता
कोलकाता : महानगर में दुर्गापूजा की धूम मची हुई है। दोपहर से ही विभिन्न पूजा पंडालों में श्रद्धालुओं और दर्शकों की भारी भीड़ उमड़ रही है। युवा पीढ़ी भी पूजा घूमने के साथ सेल्फी लेने में मशगूल नजर आ रही है। इसी बीच बेलगछिया मेट्रो स्टेशन के निकट स्थित बेलगछिया केंद्रीय सार्वजनिक दुर्गोत्सव कमेटी का पंडाल अपनी पारंपरिक कला और पर्यावरण-अनुकूल सजावट के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। कमेटी इस वर्ष अपने 99वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी है।
पारंपरिक कला के साथ शताब्दी वर्ष की देहरी पर कमेटी : कमेटी के कोषाध्यक्ष राजेंद्र अग्रवाल ने बताया कि इस वर्ष पूजा की मुख्य थीम ‘साबेकियाना के छोआए, शतवर्षेर दोरगोड़ाय’ रखी गई है, जिसका अर्थ है पारंपरिक कला के स्पर्श के साथ शताब्दी वर्ष की देहरी पर पहुंचना। कमेटी हमेशा से बंगाल की पारंपरिक कला और संस्कृति को प्राथमिकता देती रही है। इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए इस बार भी पंडाल में पारंपरिक शिल्प और कलात्मकता का विशेष ध्यान रखा गया है। पंडाल की एक खास विशेषता इसका पर्यावरण-अनुकूल स्वरूप है। इसकी सजावट में जूट की रस्सी, सूत की रस्सी, मादुर (चटाई), मिट्टी की हांडी और मिट्टी के दीये जैसी प्राकृतिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया गया है। पंडाल के आंतरिक हिस्से की कलाकारी गुजरात के कच्छ जिले के ग्रामीण घरों की दीवारों पर उकेरी जाने वाली पारंपरिक कला से प्रेरित है। इसके माध्यम से बंगाल और गुजरात की सांस्कृतिक विरासत का अनूठा संगम प्रस्तुत किया गया है। कमेटी ने इस आयोजन के जरिए पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के सदुपयोग का संदेश देने का प्रयास किया है। मिट्टी की प्रतिमा और ग्रामीण कलाकारों की मेहनत से साकार हुआ पंडाल : मंडप में मां दुर्गा की प्रतिमा पारंपरिक मिट्टी से तैयार की गई है। प्रतिमा को अत्यंत जीवंत और पारंपरिक स्वरूप प्रदान किया गया है, ताकि श्रद्धालु मां के मूल स्वरूप का दर्शन कर सकें। प्रतिमा का निर्माण युवा मूर्तिकार निरंजन करण ने किया है, जो पूर्व मेदिनीपुर जिले के कांथी क्षेत्र के निवासी हैं। प्रतिमा निर्माण का कार्य अप्रैल महीने में रथयात्रा के समय ही शुरू कर दिया गया था। पंडाल की पेंटिंग और कलात्मक सजावट का काम सरकारी कला महाविद्यालय के पूर्व छात्र नरेश हालदार के मार्गदर्शन में किया गया है। इस भव्य प्रस्तुति को साकार करने में मेदिनीपुर के कांथी अंचल के करीब 30 ग्रामीण कलाकारों ने लगभग तीन महीने तक लगातार मेहनत की। इन कलाकारों के श्रम और कौशल से पंडाल को पारंपरिक कला, ग्रामीण संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण के संदेश से जोड़ा गया है। अपने 99वें वर्ष में प्रवेश कर चुकी बेलगछिया केंद्रीय सार्वजनिक दुर्गोत्सव कमेटी का यह आयोजन न केवल बंगाल की पारंपरिक सांस्कृतिक विरासत को संजोने का प्रयास है, बल्कि आधुनिक समय में पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण पहल है।

