बांकुड़ा: मां शारदा की पावन जन्मस्थली जयरामबाटी स्थित मातृ मंदिर में महाअष्टमी के पावन पर्व पर पारंपरिक रीति-रिवाजों और पूर्ण विधि-विधान के साथ कुमारी पूजा का भव्य आयोजन किया गया। 'विशुद्ध सिद्धांत पंजिका' के नियमों का पालन करते हुए निर्धारित शुभ मुहूर्त में पूजा संपन्न हुई। इस अलौकिक दृश्य के साक्षी बनने और मां का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए राज्य के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में जुटे।
सृजिता बनीं मां दुर्गा का स्वरूप
परंपरा का निर्वहन करते हुए इस वर्ष जयरामबाटी के निकट जयपुर ब्लॉक स्थित डिहा गांव निवासी शुभदीप भट्टाचार्य और शिखा भट्टाचार्य की साढ़े पांच वर्षीय पुत्री सृजिता भट्टाचार्य को कुमारी के रूप में पूजा गया। पूजन से पूर्व बालिका को मां शारदा के पुराने घर से देवी दुर्गा के रूप में लाल वस्त्र, आभूषण और पुष्पमालाओं से विधिवत सुसज्जित कर मातृ मंदिर लाया गया। पुरोहितों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच उन्हें साक्षात मां भगवती मानकर चरण वंदन, अर्घ्य और धूप-दीप से महाआरती की।
1925 में घट-पट पूजन से हुई थी शुरुआत
जयरामबाटी में दुर्गा पूजा का इतिहास बेहद समृद्ध और श्रद्धा से परिपूर्ण है। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के अनुसार, यहां दुर्गा पूजा की शुरुआत वर्ष 1925 में घट-पट (कलश और चित्र) पूजन के साथ हुई थी। इसके लगभग सात वर्ष बाद प्रतिमा स्थापित कर भव्य दुर्गा पूजा की परंपरा शुरू की गई। तब से लेकर आज तक हर वर्ष बिना किसी बाधा के विशुद्ध पंजिका के नियमों और तिथियों का पालन करते हुए यह उत्सव मनाया जा रहा है।
'सबका मंगल हो' का गूंजा संदेश
मां शारदा सदैव अपने भक्तों को 'सबका मंगल हो' का संदेश देती थीं। रामकृष्ण परमहंस ने स्वयं मां शारदा की षोडशी पूजा कर उन्हें जगतजननी के रूप में प्रतिष्ठित किया था, वहीं स्वामी विवेकानंद ने भी उन्हें साक्षात मां दुर्गा का स्वरूप माना था। अष्टमी के इस पावन अवसर पर मातृ मंदिर का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय रहा और श्रद्धालुओं ने जयकारे लगाकर पूरे क्षेत्र को गुंजायमान कर दिया।
