एक बार एक खरगोश कहीं से घूमता-घूमता समुद्र के किनारे पहुंच गया। कुछ देर वहां बैठने के बाद उसे ह्वेल मछली दिखाई दी। ह्वेल मछली के आकार-प्रकार को देखकर खरगोश को बड़ा आश्चर्य हुआ। वह कहने लगा - वाह-वाह, कितनी भाग्यवान हो। भगवान ने तुम्हें कितना बड़ा शरीर दिया है। बड़े-बड़े समुद्री जहाजों को एक पल में उलट देती हो। जरा इधर तो आओ, मुझे तुमसे एक बात करनी है।
ह्वेल मछली किनारे पर आकर खड़ी हो गई। खरगोश ने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं कि संसार के सब प्राणियों से तुम्हारा शरीर बड़ा है परन्तु तुम में मेरे जितनी शक्ति नहीं है। मैं शरीर से भले ही बहुत छोटा हूं पर मुझमें शक्ति तुम से कहीं अधिक हैं।‘
ह्वेल मछली ने जब खरगोश की यह बात सुनी तो जोर-जोर से हंसने लगी।
खरगोश बोला, ’देखो, इसमें हंसने की कोई बात नहीं है। यदि तुम थोड़ी देर रुक सको तो मैं यह साबित कर सकता हूं कि मेरे में तुम्हारे से अधिक शक्ति है।
ह्वेल मछली ने पूछा, ’कैसे ?‘
खरगोश बोला,-’’देखो, मैं अभी जंगल में जाकर एक बहुत बड़ा रस्सा लाता हूं। उसका एक सिरा मैं तुम्हारी पूंछ के साथ बांध दूंगा और दूसरा सिरा अपनी पीठ के साथ बांध लूंगा। फिर हम दोनों एक दूसरे को खींचेंगे। यदि तुम मुझे खींचकर पानी तक ले आईं तो मैं समझूंगा कि तुम्हारे में शक्ति अधिक है और यदि मैं तुम्हें खींचकर पानी से बाहर किनारे तक ले आया तो तुम्हें मानना होगा कि शक्ति मुझमें अधिक है। बोलो, शर्त मंजूर है?‘
ह्वेल मछली ने गुस्से में कहा ’इतना अभिमान मत करो।‘
’इसमें अभिमान की कौन-सी बात है? तुम साफ-साफ क्यों नहीं कह देती कि तुममें मुझसे मुकाबला करने की शक्ति नहीं है।‘ खरगोश ने कहा। यह सुन कर ह्वेल अपने पर काबू नहीं पा सकी, बोली-जाओ, रस्सा ले आओ। मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।
खरगोश सीधा जंगल में चला गया। वहां उसे एक बहुत बड़ा हाथी मिला। खरगोश बोला ’धरती के बोझ, क्या हाल है ? हाथी ने आंखें बाहर निकालते हुए कहा, ’क्या बक रहे हो?‘
खरगोश ने बड़े धीमे स्वर में कहा, ’बक नहीं रहा हूं, सच्चाई कह रहा हूं। इतना भारी भरकम शरीर धारण करने वाले, तुम्हारे लिए तो एक छोटी-सी चींटी ही काफी है।‘
हाथी ने गुस्से में कहा, ’तुम आखिर कहना क्या चाहते हो?‘
’मैं कुछ नहीं कहना चाहता। सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि तुम्हारा इतना भारी-भरकम शरीर बेकार है। न तुम मेरे मुकाबले में भाग सकते हो और न ही तुम्हारे में मेरे जितनी शक्ति है।‘ खरगोश ने कहा।
हाथी ने हुंकार भरते हुए कहा, यदि तुमने एक शब्द भी मुंह से और निकाला तो अभी तुम्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा।‘
खरगोश ने कहा, ’देखो गजराज, इसमें इतना गुस्से करने की जरूरत नहीं है। यदि तुम मेरे से मुकाबला ही करना चाहते हो तो एक मिनट रूको। मैं अभी जंगल से एक बहुत मोटा रस्सा लाता हूं। उसका एक सिरा मैं तुम्हारे पेट के साथ बांध दूंगा और दूसरी अपनी पीठ के साथ। फिर हम दोनों एक-दूसरे को खींचेंगे। यदि तुम मुझे खींचकर इन झाडि़यों तक ले आये तो समझूंगा कि तुम्हारे में शक्ति अधिक है और यदि मैं तुम्हें खींचकर उस वृक्ष तक ले गया तो तुम्हें मानना होगा कि शक्ति मेरे में अधिक है। बोलो शर्त मंजूर है?
हाथी ने गुस्से में कहा- इतना अभिमान मत करो।
खरगोश बोला, ’इसमें अभिमान की कौन-सी बात है। तुम साफ-साफ क्यों नहीं कह देते कि तुम में मेरे साथ मुकाबला करने की शक्ति नहीं है।‘ यह सुनकर हाथी अपने आप पर काबू नहीं पा सका, ’बोला ’जाओ, रस्सा ले आओ। मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।‘
थोड़ी ही देर में खरगोश एक बहुत मोटा लंबा रस्सा लेकर हाथी के पास पहुंचा । उसने रस्से का एक सिरा हाथी के पेट के साथ बांध दिया। इतने में हाथी बोला ’दूसरा सिरा अपनी पीठ पर तो बांधो।‘
’अभी बांधता हूं। इतने में खरगोश ने दूसरा सिरा अपनी पीठ के साथ लपेट लिया और कहने लगा, ’मैं उधर समुद्र की ओर जाता हूं और किनारे पर पहुंचकर मैं तुम्हें जोर से आवाज दूंगा, खींचो, और तुम अपनी पूरी शक्ति के साथ खींचना शुरू कर देना। कहीं ऐसा न हो कि हार जाने पर तुम यह कहने लगो कि मैंने पूरा जोर तो लगाया ही नहीं।‘
इतना कहकर खरगोश सीधा समुद्र की ओर चला गया। वहां ह्वेल मछली बैठी काफी देर से खरगोश का इन्तजार कर रही थी। किनारे पर पहुंचकर उसने दूसरा सिरा ह्वेल मछली की पूंछ के साथ बांध दिया और कहने लगा ’देखो, मैं उधर जंगल की ओर जाता हूं। वहां पहुंचकर मैं तुम्हें जोर से आवाज दूंगा, खींचो, और तुम अपनी पूरी शक्ति के साथ खींचना शुरू कर देना। कहीं ऐसा न हो कि हार जाने पर तुम यह कहने लगो कि मैंने पूरा जोर तो लगाया ही नहीं। इतना कहकर खरगोश सीधा जंगल की झाड़ियों में जाकर छिप गया और जोर-जोर से कहने लगा, ’मैं तैयार हूं। खींचो,खींचो।‘
बस फिर क्या था। दोनों जानवरों ने अपना पूरा जोर लगाना शुरू कर दिया। खरगोश चुपचाप रस्से की ओर देखता रहा। रस्सा टस से मस नहीं हो रहा था। कोई आधे घण्टे तक रस्सा वहीं का वहीं तना रहा और एक इंच भी इधर-उधर नहीं हुआ। कुछ ही देर में रस्सा बीच से टूट गया और हाथी दूर जाकर पीठ के बल गिर गया। उधर ह्वेल मछली भी दूर चट्टान से टकरा कर जख्मी हो गई। इतने में खरगोश भागता हुआ हाथी के पास पहुंचा और बनावटी हांफना प्रकट करते हुए कहने लगा, ’मेरे दोस्त। तुम तो जख्मी हो गये पर मैं क्या कर सकता हूं? सारा दोष तुम्हारा ही है। मैंने तो तुमसे पहले ही कह दिया था कि मेरे से मुकाबला करना बेकार है। पर हाथी तो मारे पीड़ा के चिल्ला रहा था। उसके मुंह से तो एक भी शब्द नहीं निकल रहा था। बेचारा चुपचाप खरगोश की हर बात सुनता रहा। इसके बाद खरगोश सीधा ह्वेल मछली के पास गया और बोला, ’ओह। तुम्हारे शरीर से कितना खून बह रहा है। देखेा न, समुद्र का सारा पानी भी लाल हो गया है। मुझे बड़ा अफसोस है। मैं तुम्हें जख्मी करना नहीं चाहता था। दोष तुम्हारा ही है। मैंने तो तुम्हें लाख समझाया था कि मेरे से मुकाबला करना बेकार है पर तुमने मेरी एक न मानी। तुम्हें बल पर विश्वास था। आज विश्वास ने गर्व का सिर नीचा कर दिया।‘ पर ह्वेल के मुंह से तो एक शब्द भी नहीं निकल रहा था। बेचारी चुपचाप खरगोश की हर बात सुनती रही। इस प्रकार खरगोश ने अपनी चालाकी से दो शक्तिशाली जानवरों को हरा दिया। (उर्वशी)एस.एम. ईमाम
