शाम को जब देवेश ऑफिस से घर लौटा तो रीता उसे देखते ही खिल उठी। उनकी शादी को अभी मात्र छह माह ही बीते थे। सुबह देवेश के चले जाने के बाद रीता का दिन इंतजार की घडि़यां गिनते ही बीतता था। देवेश कमरे में घुसा तो रीता भी किसी बहाने से उसके पीछे-पीछे अंदर चली आयी। देवेश तो इसी इंतजार में था। उसने हाथ पकड़कर रीता को झटके से अपनी ओर खींचकर सीने से लगा लिया। रीता प्यार के सागर में गोते लगा रही थी कि तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। वह देवेश से छिटककर दूर जा खड़ी हुई। सामने खड़ी सास उसे घूर रही थी।
उस समय तो सास ने रीता को कुछ नहीं कहा लेकिन बाद में उसने नसीहत देते हुए कहा-’कम से कम दिन में तो सब्र कर लिया करो। जवान ननद घर में है, वह देखेगी तो क्या सोचेगी?’ सास की नसीहत के बाद रीता उदास रहने लगी। अब शाम को देवेश के आने के बाद भी उसके अंदर पहले जैसा उत्साह नहीं दिखता।
इन जोड़ों की मूक निगाहें हमेशा एक ही चीज ढूंढ़ती रहती हैं जिसे’प्राइवेसी‘ कहा जाता है।
यह समस्या सिर्फ रीता की ही नहीं है बल्कि उसके जैसी हजारों नवविवाहिताओं की समस्या है जिन्हें आज भी ’फ्लैट संस्कृति‘ के कारण जूझना पड़ता है। इन जोड़ों की मूक निगाहें हमेशा एक ही चीज ढूंढ़ती रहती हैं जिसे’प्राइवेसी‘ कहा जाता है। नवविवाहित जोड़ों के लिए प्राइवेसी की कमी एक गंभीर समस्या के रूप में उभरकर सामने आ रही है। प्राइवेसी का मतलब ऐसे पलों से है जिसमें पति-पत्नी स्वच्छंद प्रेमालाप या आपस में बातचीत कर सकें। मध्यवर्गीय परिवारों में घरों के छोटे होते आकार ने प्राइवेसी को दुर्लभ बनाकर रख दिया है। इस समस्या से सबसे अधिक नवविवाहित जोड़े ही प्रभावित होते हैं।
यूं तो पति-पत्नी एक-दूसरे के सामीप्य के आकांक्षी आजन्म रहते हैं किन्तु शादी के बाद एक-दो साल तक एक-दूसरे का साथ पाने के लिए हरदम लालायित रहते हैं और मौका पाते ही एक-दूसरे की बांहों में कैद हो जाना चाहते हैं लेकिन उनकी इस चाहत में बाधक होता है पारिवारिक माहौल।
खासकर महिला के लिए यह समस्या अत्यंत गंभीर होती हैं। एक तरफ जहां महिलाएं दिनभर अपने पति से अलग रहने के बाद शाम को उनके वापस आते ही बांहों में समाने का ख्वाब देखती रहती हैं, वहीं संयुक्त परिवार में किसी के देखे जाने का भय भी सताता रहता है। इस स्थिति में उसे मानसिक तनाव से गुजरना पड़ता है। यह तनाव कई बार कलह का कारण भी बन जाता है और मात्र ’प्राइवेसी‘ न मिलने के कारण ही कई बार विवाहिता अपने ससुराल वालों से अलग होकर अपने पति के साथ रहने में भी परहेज नहीं करती। प्राइवेसी की यह समस्या शादी के दो-चार सालों तक ही अधिक रहती है। उसके बाद महिला परिवार के माहौल के अनुसार खुद ही ढल जाती है।
प्राइवेसी न मिलने के कारण सर्वप्रथम नवविवाहिता मानसिक तनावों से जकड़ जाती है। उसके बाद शनैः-शनैः उसमें सेक्स के प्रति अरूचि, काम शैथिल्यता, चेहरे पर पीलापन का आना, याददाश्त में कमी का होना, ल्यूकोरिया, अनियमित मासिक का होना, रक्ताल्पता, नींद की कमी आदि होने लगती है और कभी-कभी वह स्थिति चरम पर पहुंचकर माइग्रेन तथा हिस्टीरिया जैसी व्याधियां भी उत्पन्न कर देती है।
विवाह से पूर्व प्रायः सभी युवक-युवतियां शादी के बाद की रोचक कल्पनाएं किया करते हैं। उनके मन में इन विचारों के कारण रासायनिक स्रावों का स्रावित होना प्रारंभ हो जाता है। तन-मन के मिलन की कामनाओं से उनका शरीर विकसित होने लगता है, किन्तु शादी के बाद जब ’फ्लैट संस्कृति‘ के कारण उनकी कामनाओं पर कुठाराघात होने लगता है तो उनमें शारीरिक एवं मानसिक अनेक बीमारियां पहुंचकर उन्हें उग्र बना डालती हैं।
दो-तीन कमरों के फ्लैट में भरा पूरा परिवार रहने से नव-विवाहित जोड़े को प्राइवेसी मिलना लगभग नामुमकिन हो जाता है। दाम्पत्य संबंधों के जानकारों का मानना है कि शादी के बाद एक-दूसरे को समझने के लिए प्राइवेसी बेहद जरूरी है। दिन भर की थकान के बाद केवल बिस्तर की प्राइवेसी ही अहमियत नहीं रखती। इसके लिए परिवार के सदस्यों को चाहिए कि दिन के समय में भी नवविवाहित जोड़ों को एकान्त में रहने का अवसर प्रदान करें।
परिवार वालों को चाहिए कि वे नवदंपति के कमरे में एकाएक न घुसें।
दंपति की बातों को छिपकर सुनने अथवा उन्हें छिपकर देखने की कोशिश कतई न की जाए।
नवदंपति को बाहर घूमने जाने के लिए प्रेरित करें।
घर पर उन्हें अकेला छोड़कर पास-पड़ोस में चले जाएं।
अनावश्यक टोकाटाकी कतई न करें।
देर रात नवदंपति को डिस्टर्ब न करें ।
जरूरत का सामान उनके बिस्तर पर जाने से पहले ही कमरे से निकाल लें।
नवदंपति को भी स्वयं को पारिवारिक माहौल में ढालने का प्रयास करना चाहिए।
आराम करने से पहले कमरे का दरवाजा बंद कर लें। रात को जी भर कर बातें करें।
परिवार वालों से अनुमति लेकर सप्ताह में एक बार सैर के लिए अवश्य निकलें।
इस प्रकार परिजन एवं नव दंपति एक-दूसरे को समझकर आपसी सूझबूझ से प्राइवेसी की समस्या को दूर कर सकते हैं। जब तक दोनों पक्षों का सहयोग नहीं होगा, तब तक प्राइवेसी की समस्या बनी रहेगी और नवदंपतियों की कल्पनाएं साकार नहीं हो सकेंगी। (उर्वशी)
आरती रानी
