सन्मार्ग संवाददाता
बीरभूम : तारापीठ मंदिर में विराजमान मां तारा आखिरकार अपने मूल गर्भगृह में लौटने जा रही हैं। दो बार तारीख बदलने के बाद अब मंदिर कमेटी ने तय किया है कि 25 अक्टूबर, कोजागरी लक्ष्मी पूजा के दिन मां को गर्भगृह में पुनः स्थापित किया जाएगा। इस दिन मां की पूजा 'राजराजेश्वरी' वेश में महालक्ष्मी के रूप में की जाएगी। मंदिर कमेटी के अनुसार, मूल रूप से महालया से पहले और फिर दुर्गा पूजा की षष्ठी को मां को गर्भगृह में लाने की योजना थी, लेकिन गर्भगृह के जीर्णोद्धार का काम पूरा न होने से ऐसा संभव नहीं हो सका। मंदिर में करीब डेढ़ करोड़ रुपये की लागत से गर्भगृह का जीर्णोद्धार चल रहा है। वेदी की ऊंचाई आठ इंच बढ़ाई गई है। अयोध्या के राम मंदिर के कारीगरों द्वारा विशेष रेलिंग बनाई जा रही है, जिसके दिल्ली से तारापीठ पहुंचने में देरी के कारण काम में विलंब हुआ। तारापीठ मंदिर कमेटी के सचिव पुलक चट्टोपाध्याय ने बताया, "कौशिकी अमावस्या के दो दिन बाद जीर्णोद्धार के लिए मां तारा को गर्भगृह से निकालकर शिव मंदिर में स्थापित किया गया था। कुछ तकनीकी कारणों से महालया और षष्ठी पर उन्हें वापस नहीं ला सके। अब चतुर्दशी के दिन सुबह मां तारा को शिव मंदिर से विश्राम मंच पर लाया जाएगा। 25 अक्टूबर को दिनभर वहीं पूजा और दर्शन के बाद संध्या आरती के पश्चात उन्हें उनके निज निवास, मूल गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा।" उन्होंने बताया कि नई वेदी पर स्थापना से पहले शुद्धिकरण सहित सभी धार्मिक अनुष्ठान पूरे किए जाएंगे। इस दौरान नित्य पूजा और भक्तों के दर्शन में कोई बाधा नहीं आई है, शिव मंदिर में ही मां की नित्य सेवा जारी है। मंदिर के संस्थापक जगन्नाथ राय के वंशजों से चर्चा के बाद ही कोजागरी लक्ष्मी पूजा के शुभ लग्न को चुना गया है।
