बांकुड़ा: जिले के ऐतिहासिक शहर विष्णुपुर में मल्ल राजवंश की 1030 साल पुरानी दुर्गापूजा की राजसी परंपरा शनिवार को महासप्तमी के मौके पर पूरे वैभव के साथ जीवंत हो उठी। राजघराने की कुलदेवी मां मृण्मयी की नवपत्रिका स्नान यात्रा के तहत छोटो ठाकुरुण ( छोटी ठाकुर रानी) यानी महालक्ष्मी के स्वरूप पट का ऐतिहासिक गोपाल सायर (सरोवर) में विधि-विधान से महास्नान कराया गया।
स्नान के बाद मंत्रोच्चार के बीच जैसे ही डोली मंदिर की दहलीज में दाखिल हुई, सरोवर तट से लगातार तीन बार तोपों की सलामी दी गई। तोप की गड़गड़ाहट के साथ ही पूरा परिसर ‘जय मां मृण्मयी’ के जयकारों से गूंज उठा। इस ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने के लिए दूर-दराज से हजारों श्रद्धालु मंदिर परिसर में जुटे।
चरणबद्ध तरीके से मंदिर में स्थापित होती हैं तीन देवियां
मल्ल राजवंश की 10 सदी पुरानी पूजा पद्धति बेहद अनूठी है। यहां नवपत्रिका प्रवेश और देवियों की प्रतिष्ठा एक साथ न होकर तीन अलग-अलग दिनों में चरणबद्ध तरीके से संपन्न होती है:
1. बड़ी ठाकुर रानी (महाकाली): सबसे पहले 'जीता षष्ठी' के दिन बड़ो ठाकरुण( बड़ी ठाकुर रानी) यानी महाकाली के चित्रपट स्वरूप का महास्नान कराकर उन्हें राजमंदिर के गर्भगृह में स्थापित किया गया।
2. मझली ठाकुर रानी (महासरस्वती): परंपरा के दूसरे चरण में शुक्रवार को मेजो ठाकरुण यानी मां महासरस्वती का विधिवत अनुष्ठान पूरा कर उन्हें मंदिर में प्रतिष्ठित किया गया।
3. छोटी ठाकुर रानी (महालक्ष्मी): आज छोटो ठाकरुण (महालक्ष्मी स्वरूप) के मंदिर प्रवेश और तोपों की सलामी के साथ ही मां मृण्मयी की मुख्य राजसी पूजा का विधिवत शुभारंभ हुआ।
चित्रपट स्वरूप की होती है आराधना
विष्णुपुर की इस ऐतिहासिक पूजा की खासियत यह है कि यहां मुख्य प्रतिमा के साथ देवी दुर्गा के तीनों रूपों को विशेष चित्रपट (पट) के रूप में पूजा जाता है। 1030 साल पहले मल्ल राजा जगत मल्ल द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी बिना किसी बदलाव के उसी राजसी ठाठ-बाट, तोपों की सलामी और प्राचीन रीति-रिवाजों के साथ निभाई जा रही है।
