लखनऊ : इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने 46 साल पुराने हत्याकांड के मामले में दोषी ठहराए गए दो लोगों की सजा रद्द कर दी है क्योंकि अदालत ने पाया कि अपराध के समय दोनों नाबालिग थे। हालांकि, पीठ ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उचित सजा तय करने के लिए मामला किशोर न्याय बोर्ड को भेज दिया है।
न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति प्रमोद कुमार श्रीवास्तव की खंडपीठ ने यह आदेश दिया। मामला 28 सितंबर 1980 को सुलतानपुर में हुई एक हिंसक घटना से संबंधित अपील से जुड़ा है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पुरानी रंजिश में आठ लोगों ने धारदार हथियारों और भालों से हमला कर शमशाद, अब्दुल रफीक, दिलशेर और हमीदुल्लाह की हत्या कर दी थी। हमले में कई अन्य लोग भी घायल हुए थे।
सत्र अदालत ने 14 दिसंबर 1981 को सभी आठ आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
उच्च न्यायालय में अपील लंबित रहने के दौरान अपीलकर्ताओं सिराज अहमद और अब्दुल वाहिद ने दावा किया कि घटना के समय वे नाबालिग थे जिसके बाद उच्च न्यायालय के निर्देश पर किशोर न्याय बोर्ड ने उनकी उम्र की जांच की।
बोर्ड की रिपोर्ट और शैक्षणिक अभिलेखों के आधार पर अदालत ने पाया कि अपराध के समय सिराज की उम्र 17 साल 10 महीने और अब्दुल वाहिद की उम्र 17 साल 11 महीने थी।
पीठ ने उनकी दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए कहा कि घायलों और अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान चिकित्सकीय साक्ष्यों से मेल खाते हैं और अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में सफल रहा है, इसलिए दोषी ठहराए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
पीठ ने कहा कि अपराध के समय दोनों के नाबालिग होने के कारण सामान्य आपराधिक कानून के तहत दी गई सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। दोनों दोषियों को बिना सजा के नहीं छोड़ा जा सकता, लेकिन उनके मामले में किशोर न्याय कानून के प्रावधानों के अनुसार ही उचित आदेश पारित किया जाना चाहिए।
पीठ ने दोनों अपीलकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे 28 अक्टूबर को फैसले की प्रमाणित प्रति के साथ संबंधित किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश हों। अदालत ने बोर्ड को प्रमाणित प्रति मिलने के छह सप्ताह के भीतर उचित आदेश पारित करने का निर्देश भी दिया।
