बहुत पुरानी बात है। सैकड़ों साल पहले कौशांबी नाम का एक राज्य था । उसकी राजधानी कौशांबी नामक नगर में थी। उसी नगर में देवधर नाम का एक विद्वान ज्योतिषी रहता था । उसके ज्योतिष ज्ञान के चर्चे न केवल कौशांबी राज्य में अपितु राज्य से बाहर भी थे।
देवधर का एक लड़का था, शांतिधर। देवधर जितना ज्योतिष का ज्ञानी था, शांतिधर उतना ही अज्ञानी बल्कि उसे मंदबुद्धि मूढ़मति समझा जाता था। देवधर अपने पुत्र को लेकर सदा परेशान रहता। कभी कभी तो वह शांतिधर को उलाहने देता कि देखो, दूर-दूर तक के लोग मेरे ज्ञान का लोहा मानते हैं और तुम हो कि तुम्हें कुछ भी नहीं आता जाता।
उसे सदा शांतिधर की चिंता रहती पर वह लाचार था। पुत्र को पढ़ाता लिखाता और बहुत समझाता लेकिन शांतिधर के कुछ भी पल्ले न पड़ता। वास्तव में अभी शांतिधर की आयु भी कम थी मगर उधर देवधर को अपने ज्ञान का बड़ा अभिमान था। उसे संभवतः यह सनक सवार हो गयी थी कि ज्ञानी लोग बाल्यावस्था से ही तीक्ष्ण बुद्धि के होते हैं और इसलिए शांतिधर को बचपन में ही बहुत कुछ सीख लेना चाहिए।
धीरे-धीरे शांतिधर बड़ा होने लगा। लगभग दस वर्ष की आयु में पहुंचकर वह बहुत कुछ समझने लगा। बड़े यत्न से देवधर ने उसे विद्याध्ययन कराना प्रारंभ किया। बहुत से बच्चों को इस बीच उसने पढ़ाया था। वह अनुभव उसके काम आए और उसने अपने पुत्र पर प्रयोग किये। अपने मित्रों और संतों आचार्यों से भी शिक्षा प्रदान करने के सूत्र लेकर शांतिधर पर आजमाए। लगभग 5 वर्ष के कड़े परिश्रम के बाद शांतिधर ज्योतिष विद्या अच्छी तरह सीख गया।
देवधर को प्रायः इस बात पर लोगों के कटाक्ष सुनने को मिलते थे कि उसका पुत्र मंदबुद्धि है। देवधर जल्दी से जल्दी अपने बच्चे को जनता के समक्ष प्रस्तुत कर यह जताना चाहता था कि उसका बच्चा अब ज्ञानी है। उसे पिता द्वारा प्रदत्त ज्योतिष विद्या का तो अच्छा ज्ञान हो गया था लेकिन वह व्यावहारिक और सामान्य ज्ञान में कच्चा था। इस बात पर देवधर का ध्यान नहीं था। एक दिन पुत्र के ज्योतिष ज्ञान से उत्साहित देवधर ने राजदरबार में बातों-बातों में कह दिया कि अब उसका पुत्र ज्योतिष विद्या में प्रवीण हो गया है। राजा ने तपाक से कहा,’ तो फिर देवधर जी, किसी दिन अपने पुत्र को यहां दरबार में लाइये। हम सब लोग भी उसके ज्ञान को परखें और लाभान्वित हों।
सब दरबारियों ने भी हां में हां मिलाई तो देवधर अगले ही दिन पुत्र को दरबार में लाने के लिए तैयार हो गया। उसे स्वयं भी पुत्र को दरबार में प्रस्तुत करने के लिए मौके की तलाश थी और अब वह अवसर मिल गया था। अगले दिन उसने शांतिधर को ठीक से तैयार किया और दरबार में ले गया। राजा ने देवधर से पूछा,’ हमें इस बात का पता कैसे चलेगा कि आपके पुत्र को ज्योतिष विद्या का क्या ज्ञान है? देवधर ने कहा राजन, आप शांतिधर से कोई प्रश्न पूछिए। यदि उसे ज्ञान होगा तो वह उत्तर देगा।’
राजा बोला,’ यह बात सही है।’ अब तक राजा अपनी अंगुली की अंगूठी को अपनी मुठ्ठी में बंद कर चुका था। उसने शांतिधर से पूछा,’ बताओ, मेरी मुट्ठी में क्या है’! शांतिधर ने कहा,’ आपके हाथ में लकड़ी, पत्थर या जीव नहीं बल्कि धातु की ठोस वस्तु है। वह गोल है और उसके मध्य छेद है।’
राजा बेसाख्ता कह उठा,’ बहुत-बहुत खूब! ज्ञान अच्छा है। अब वस्तु का नाम भी बता दो।’ शांतिधर ने फिर अपना ज्योतिषीय गणित लगाया। बहुत देर सोचा और फिर बोला,’ आपकी मुट्ठी में चक्की है।’ इतना सुनते ही राजा के मुंह से हंसी निकल गई। उसने हंसते हुए कहा,’ शांतिधर तुम रहे कोरे के कोरे। तुमने शास्त्रों का ज्ञान तो पा लिया लेकिन व्यावहारिक ज्ञान में अधूरे रहे। तुम्हारे दिमाग में यह बात नहीं आयी कि जरा सी मुट्ठी में बड़ी सी चक्की कैसे आएगी जबकि पहले तुमने यह भी कहा था कि मुट्ठी में पत्थर भी नहीं है।
देवधर के उत्साह पर पानी फिर गया था। उसे भी पछतावा हुआ कि बच्चे को केवल किताबी ज्ञान ही नहीं व्यावहारिक ज्ञान भी जरूरी हैं। देवधर फिर से शांतिधर को किताबी ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान देने में जुट गया। उसने तय किया कि अब वह शांतिधर के मामले में जल्दबाजी नहीं करेगा और समय बीतने के साथ शांतिधर स्वयं भी बहुत कुछ सीख जाएगा। (उर्वशी)ए.पी. भारती
