कोलकाता : दुर्गापूजा के दौरान भव्य पंडालों, रंग-बिरंगी रोशनी और उत्सवी माहौल के लिए प्रसिद्ध कोलकाता में इस वर्ष उत्सव का एक अलग रूप देखने को मिला। उत्तर कोलकाता से लेकर दक्षिण कोलकाता तक दुर्गापूजा और प्रतिमा विसर्जन के दौरान शोर-शराबा अपेक्षाकृत कम रहा।
स्थानीय निवासियों के अनुसार, इस बार पंडालों में तेज आवाज वाले लाउडस्पीकरों और देर रात तक बजने वाले संगीत में कमी देखी गई। यह बदलाव बेहाला, ढाकुरिया और अमहर्स्ट स्ट्रीट जैसे इलाकों में भी महसूस किया गया। इस वर्ष पूजा का माहौल अपेक्षाकृत शांत रहा।
बुजुर्गों और स्थानीय निवासियों ने महसूस किया बदलाव
दुर्गापूजा के दौरान तेज संगीत और लाउडस्पीकरों की आवाज से परेशान रहने वाले स्थानीय निवासियों के लिए इस बार का माहौल कुछ राहत देने वाला रहा। उनका कहना है कि आसपास के पूजा पंडालों से आने वाली तेज आवाज के कारण बुजुर्गों को काफी परेशानी होती थी। इस बार उत्सव के दौरान शोर अपेक्षाकृत कम रहने से अंतर स्पष्ट महसूस हुआ।
प्रतिमा विसर्जन के दौरान भी डीजे का शोर कम
इस वर्ष प्रतिमा विसर्जन के जुलूसों में भी तेज आवाज वाले डीजे सिस्टम का इस्तेमाल अपेक्षाकृत कम देखने को मिला। उत्तर कोलकाता के अमहर्स्ट स्ट्रीट जैसे घनी आबादी वाले इलाकों में यह बदलाव विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा, जहां संकरी आवासीय सड़कों पर पारंपरिक रूप से पूजा का उत्साह आसपास के क्षेत्रों तक फैलता है।
अमहर्स्ट स्ट्रीट निवासी मृत्युंजय सेन ने कहा कि अनावश्यक रूप से तेज आवाज पर नियंत्रण से उत्सव अधिक समावेशी बन सकता है। इससे उन लोगों को भी राहत मिलती है, जिन्हें तेज ध्वनि से परेशानी होती है।
चोर बागान हादसे के बाद सुरक्षा और भीड़ प्रबंधन पर जोर
इस वर्ष पूजा के अपेक्षाकृत शांत रहने के पीछे 17 अक्टूबर को उत्तर कोलकाता के चोर बागान पूजा मंडप में हुई दुखद भगदड़ भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ रही। इस घटना के बाद कई पूजा समितियों ने कुछ समय के लिए आम लोगों का प्रवेश रोका और भीड़ प्रबंधन से जुड़ी व्यवस्थाओं की समीक्षा की।
ध्वनि प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए नियमों की भूमिका
पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कार्यकर्ता और सबुज मंच के महासचिव नबा दत्ता ने इस बात पर जोर दिया कि शोर में आई कमी को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि क्या यह लोगों के व्यवहार में स्थायी बदलाव है या परिस्थितियों के कारण इस वर्ष अपनाया गया अस्थायी संयम।
जानकारी के अनुसार, बिधाननगर में पूजा आयोजकों को ध्वनि का स्तर 70 डेसीबल तक सीमित रखने और रात 10 बजे के बाद सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणालियों का उपयोग बंद करने के निर्देश दिए गए थे। ऐसे नियमों ने भी उत्सव के दौरान ध्वनि नियंत्रण को बढ़ावा देने में भूमिका निभाई हो सकती है।
दुर्गापूजा कोलकाता की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा है। ऐसे में उत्सव की भव्यता, लोगों की भागीदारी और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना महत्वपूर्ण है। इस वर्ष के अनुभव ने यह चर्चा जरूर तेज की है कि धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में उल्लास बनाए रखते हुए ध्वनि प्रदूषण को कम करना संभव है।
यदि पूजा समितियां, प्रशासन और नागरिक मिलकर इस दिशा में प्रयास जारी रखते हैं, तो उत्सव का आनंद अधिक लोगों के लिए सहज और सुविधाजनक बनाया जा सकता है।
